मेरे जहन में एक सवाल था। वो मुझ तक ही रह जाये तो अच्छा है।
एक जज्बाती ख्याल था। वो मुझ तक ही रह जाये तो अच्छा है।
बेकरारी है बहोत अधर में। ये बेकरारी बेकदर ही रह जाये तो अच्छा है।
कुछ गुलाब किताबो में ही रहते हैं उमर भर । ये लम्हा भी कहीं यादो में सिमट जाये तो अच्छा है।
सुन रहा हूँ गूंज इस सवाल की। मगर ये मुझ से टकराकर ही पलट जाये तो अच्छा है।
शिकायत थी तूझे के मैं कहता नही कुछ। कह के अनसुना रह जाने से तो वो अच्छा है।
तेरे बारे सोचता नही था पहरो पहर। अब तो ये कुछ पल भी बचा लू तो अच्छा है।
तम्मना तेरे दीदार की इतना कहर । अब ये तम्मना अधूरी रह ही जाये तो अच्छा है।
तेरी बाँहों में तो मैं पिघल जाता | पिघल कर बह जाने से तो पत्थर हो जाना ही अच्छा है।
ढ़ल गया हूँ एक टेढ़े सांचे में| टूटे हुए सांचे से जाया होने से तो अच्छा है।
बची है कुछ ऐसी मुलाकाते के वो न हो पाएं तो अच्छा है।
कहीं बिखर न जाये मेरे अरमान । ये यहीं डिब्बे मैं बंद रह जाये तो अच्छा है ।
मैं गुमनाम सही कहीं तेरे दोस्तों में। मेरी हस्ती बेनाम ही रह जाये तो अच्छा हैं।
मैं आया था साये की तरह । अब ये साया अँधेरे में खो जाये तो अच्छा है।
कहने को तो मेरे पास है पूरी कहानी अपनी । मगर ये कविता चंद लफ्जो में सिमट जाये तो अच्छा है।
अनपुछे सवालो का जवाब जब मिले तो सवाल मुझ तक ही रह जाये तो अच्छा है।